भास्कर की सोच पूरी तरह बदल चुकी थी
इसी समय भास्कर अचानक मां को फोन करके कहता है कि वह दोबारा शादी कर ले। सेलवी को विश्वास नहीं होता। यही बेटा कुछ साल पहले उसकी उम्र और समाज की बात करके विवाह से मना करता था। अब वह खुद उसी बात पर जोर दे रहा है। उसे लगता है भास्कर मजाक कर रहा है या किसी दबाव में है।
वह नाराज होकर दो दिन उससे बात तक नहीं करती। भास्कर लगातार समझाने की कोशिश करता है। वह कहता है कि वह और विवेक अब बड़े हो चुके हैं। मां ने अपनी पूरी जवानी सिर्फ उन्हें पालने में लगा दी। अब जब दोनों अपनी जिंदगी बनाने वाले हैं तो सेलवी को भी अपनी जिंदगी जीने का पूरा अधिकार है।
भास्कर का यह बदलाव अचानक नहीं हुआ। उसे शहर में रहने के दिनों की एक छोटी घटना याद है। तब सेलवी अक्सर उसके कमरे में छोटे-मोटे काम करने आ जाती थी। एक दिन कमरे में चूहा आ गया और सेलवी ने उसे मार दिया। उस छोटे दृश्य में भास्कर को मां की पूरी जिंदगी दिखाई दी—वह खुद अपने बच्चों के लिए हर मुश्किल, गंदगी, अपमान और डर से लड़ती रही, जैसे अपनी जरूरतों का कोई महत्व ही न हो।
भास्कर उसी सिस्टर के पास भी जाता है जिसने कॉलेज में उसका साथ दिया था। वह स्वीकार करता है कि कुछ साल पहले मां ने शादी की बात की थी और उसने ही मना कर दिया था। अब उसे लगता है कि उसने बड़ी गलती की। सिस्टर समझाती है कि इंसान को केवल खाना और नींद ही नहीं, एक साथी भी चाहिए। शारीरिक रूप से कोई अकेला जी सकता है, लेकिन भावनात्मक खालीपन अलग चीज है। सेलवी ने अपनी इच्छाएँ बेटों के लिए दबा दीं।
भास्कर के लिए यही अंतिम समझ है। वह तय करता है कि जब तक मां को जीवन साथी नहीं मिलेगा, वह अपनी शादी नहीं करेगा। उसके लिए यह मां पर कोई एहसान नहीं, बल्कि उस पुराने अन्याय को सुधारने की कोशिश है जिसमें उसने भी हिस्सा लिया था।
वंदना और नकली सगाई की योजना
इसी दौरान भास्कर के लिए विवाह का दबाव भी बढ़ रहा है। वह एक मैट्रिमोनी सेवा में वंदना नाम की लड़की का प्रोफाइल देखता है और औपचारिक मुलाकात के लिए उसके घर जाता है। वहाँ एक बिल्कुल अलग परिवार मिलता है। वंदना के घर वालों को हर चीज का वीडियो बनाना पसंद है। कोई खाना बना रहा हो, कोई मेहमान आए या कोई बात हो—कैमरा तुरंत चालू हो जाता है।
भास्कर बैठते ही अपनी मां की पूरी कहानी बताता है। वह साफ कहता है कि फिलहाल उसका मुख्य उद्देश्य अपनी शादी नहीं बल्कि सेलवी का पुनर्विवाह कराना है। वंदना उससे प्रभावित होती है। वह पूछती है कि यह बात उसके लिए इतनी जरूरी क्यों है। भास्कर अपने बचपन, मां के संघर्ष, केरल जाने और अपनी सोच बदलने की कहानी बताता है।
वंदना उसके विचारों की तारीफ करती है। तब भास्कर एक असामान्य योजना रखता है—वे कुछ समय के लिए सगाई तय होने का नाटक करेंगे। इससे वंदना के घर वाले शांत रहेंगे और भास्कर को मां की शादी का इंतजाम करने का समय मिल जाएगा। वंदना इसे समझती है और योजना मान लेती है।
सेलवी जब सुनती है कि लड़की वाले इतनी आसानी से मान गए तो उसे शक होता है। उसे लगता है कुछ छिपाया जा रहा है। विवेक को भी बाद में पूरी बात पता चलती है और वह भास्कर से झगड़ता है। वह भाई को याद दिलाता है कि कभी उसी ने मां के पुनर्विवाह का विरोध किया था। भास्कर कहता है कि यही कारण है कि अब वह अपनी गलती सुधारना चाहता है।
भाई की बेटी से शादी का पारिवारिक दबाव
गांव में सेलवी का भाई भी अपने हिसाब से दोनों बेटों का भविष्य तय करना चाहता है। एक पारिवारिक समारोह में वह घोषणा करता है कि भास्कर या विवेक में से किसी एक की शादी उसकी बेटी से होनी चाहिए। स्थानीय परंपरा में ऐसा रिश्ता असामान्य नहीं माना जाता, लेकिन दोनों भाई इसके पक्ष में नहीं।
वे बहाने बनाते हैं कि लड़की अभी छोटी है, पढ़ रही है और शादी की कोई जल्दी नहीं। मामा इसे अपने सम्मान का सवाल बना लेता है। वह कहता है कि अगर दोनों में से किसी ने भी उसकी बेटी से शादी नहीं की तो वह दोबारा उनके घर कदम नहीं रखेगा। यह दबाव आगे सेलवी के अपने पुनर्विवाह के विरोध से भी जुड़ जाता है।
दूसरी तरफ संध्या ने बड़ी मुश्किल से अपने माता-पिता को विवेक के रिश्ते के लिए कुछ हद तक राजी किया है। लेकिन जब उसे पता चलता है कि भास्कर पहले मां की शादी करवाना चाहता है, वह घबरा जाती है। उसके घर वाले अगर सेलवी के पुनर्विवाह की बात सुनेंगे तो वे विवेक का रिश्ता तुरंत तोड़ सकते हैं।
विवेक और संध्या में इसी मुद्दे पर बहस होती है। बात लगभग ब्रेकअप तक पहुँचती है। दुर्भाग्य से सेलवी उनकी बातचीत सुन लेती है और उसे लगता है कि उसके कारण बेटे की जिंदगी खराब हो रही है। वह भास्कर पर गुस्सा करती है कि उसकी जिद से सब रिश्ते टूट रहे हैं।
वंदना भी भास्कर से पूछती है कि यह सब आखिर कहाँ जा रहा है। भास्कर सच बता देता है कि उनकी सगाई वाली योजना नाटक थी और मां अभी भी शादी के लिए तैयार नहीं। उसके लिए अब कोई भी नकली योजना काम नहीं कर सकती। वह अपनी मां से भी साफ कह देता है कि जो कुछ हुआ था वह अभिनय था।
सेलवी फिर घर छोड़ देती है
तनाव इतना बढ़ जाता है कि उसी रात भास्कर और विवेक बिना खाना खाए शहर चले जाते हैं। सेलवी को लगता है कि दोनों उससे नाराज हैं और उसके कारण उनके अपने रिश्ते टूट रहे हैं। वह बिना किसी को बताए केरल जाने का फैसला करती है। उसके मन में यह भी है कि शायद कुछ समय दूर रहने से बेटों को अपनी गलती और उसकी पीड़ा समझ आएगी।
यहीं कहानी शुरुआती दृश्य पर लौटती है। रात, सुनसान रास्ता, छूटी हुई बस और जंगल। जंगली सूअर उसके सामने आता है, वह भागती है और गहरे कुएं में गिर जाती है। सिर की चोट से बेहोश होकर पानी में पड़ी रहती है।
दूसरी तरफ जब बेटों को पता चलता है कि मां घर से गायब है तो दोनों घबरा जाते हैं। वे मंदिर, बस स्टैंड, आसपास के गांव और केरल तक संभावित जगहों में उसे ढूंढते हैं। पुलिस में भी शिकायत करते हैं, लेकिन कई दिन तक कोई जानकारी नहीं मिलती। दोनों को पहली बार अहसास होता है कि मां से नाराज होकर अलग होना कितना छोटा था और उसे सच में खो देना कितना भयावह हो सकता है।
मैरी ने कुएं से सेलवी की जान बचाई
कुछ दिनों बाद अस्पताल से फोन आता है। वहाँ मैरी नाम की महिला पुलिस को बयान देती है। वह बताती है कि उस रात कुछ ईसाई लोग रास्ते से गुजर रहे थे और उसे झाड़ियों की तरफ किसी महिला की आवाज सुनाई दी। वह उधर दौड़ी तो आसपास कोई नजर नहीं आया, सिर्फ एक पुराना कुआं था। शक होने पर उसने नीचे देखा और फिर बिना देर किए खुद कुएं में उतर गई।
अंदर बेहोश सेलवी मिली। मैरी ने किसी तरह उसे पानी से बाहर निकाला और मदद बुलाकर अस्पताल पहुँचाया। होश आने पर सेलवी सबसे पहले अपने बेटों को याद करके रोती है। उसके भीतर का गुस्सा खत्म हो चुका है। वह सिर्फ भास्कर और विवेक को देखना चाहती है।
लेकिन उसके रिश्तेदार घटना को अपनी सोच के हिसाब से समझते हैं। सेलवी का भाई मानता है कि उसके बेटों ने उसकी बेटी से शादी करने से मना किया इसलिए सेलवी दुख में घर छोड़कर चली गई। बाद में भास्कर और विवेक मां से माफी मांगते हैं। सेलवी भी साफ कहती है कि वह बच्चों को दुख देकर कुछ नहीं पाना चाहती।
मेघला की घटना ने सेलवी को अंतिम फैसला दिया
कुछ समय बाद गांव में मेघला नाम की बहुत कम उम्र की लड़की के पति की मौत हो जाती है। मेघला मुश्किल से बीस-बाईस साल की है और अचानक विधवा हो जाती है। उसे देखकर सेलवी फूट-फूटकर रोती है। भास्कर पहले सोचता है कि मां फिर कोई भावनात्मक नाटक कर रही है, मगर सेलवी साफ कहती है कि वह सच में मेघला के लिए रो रही है।
वह कहती है कि इतनी छोटी उम्र में विधवा होना किस तरह जिंदगी बदल देता है, यह कोई उससे पूछे। समाज मान लेता है कि पति के साथ महिला की अपनी इच्छाएँ और भविष्य भी मर गए। लेकिन असल में वह जिंदा रहती है, उसे अकेलापन महसूस होता है, उसे सम्मान और साथी की जरूरत होती है, और फिर भी उसे जीवन दोबारा शुरू करने से रोका जाता है।
भास्कर उसे समझाता है कि यही कारण है कि वह मां की शादी करवाना चाहता है। अगर सेलवी गांव के सामने पहला कदम उठाएगी तो मेघला जैसी दूसरी महिलाओं को भी साहस मिलेगा। विधवा होने का अर्थ जिंदगी खत्म होना नहीं। नई शुरुआत संभव है।
इस बार सेलवी की सोच बदलती है। कुछ देर बाद वह खुद भास्कर को फोन करती है और कहती है कि वह शादी के लिए तैयार है। जो भी होगा, देखा जाएगा। भास्कर और विवेक दोनों खुशी से भर जाते हैं। वर्षों से दबा हुआ विषय पहली बार मां की अपनी सहमति से आगे बढ़ता है।
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