कहानी की शुरुआत रात के समय एक सुनसान रास्ते से होती है। सेलवी नाम की एक मध्यम उम्र की महिला अकेली चल रही है। वह किसी को बिना बताए घर से निकली है और केरल की तरफ जाने का इरादा रखती है। रास्ते में एक आदमी उससे पूछता है कि वह कहाँ जा रही है, तो वह सही जगह बताने से बचती है। उसके चेहरे पर घबराहट भी है और जिद भी, जैसे वह अपने ही बच्चों से नाराज होकर कोई बड़ा फैसला करके निकली हो।
कुछ दूरी पर उसे बस पकड़नी होती है, लेकिन वह बस निकल जाती है। अब रात और गहरी हो चुकी है। सेलवी पैदल ही आगे बढ़ती है। इसी दौरान रास्ते से कुछ ईसाई लोग गुजरते दिखाई देते हैं। वह उनसे बचने के लिए झाड़ियों की तरफ चली जाती है, मानो किसी को अपना चेहरा नहीं दिखाना चाहती। अचानक जंगल में एक जंगली सूअर उसके सामने आ जाता है। घबराकर वह भागती है, पैर फिसलता है और सीधे एक गहरे कुएं में गिर जाती है। सिर में चोट लगती है और वह पानी के भीतर बेहोश हो जाती है।
यह दृश्य बहुत गंभीर है, लेकिन फिल्म तुरंत नहीं बताती कि सेलवी इस हालत में यहाँ कैसे पहुँची। कहानी समय में पीछे जाती है और हमें उसके पूरे जीवन की वह यात्रा दिखाती है जिसके कारण एक मां अपने ही बच्चों से नाराज होकर रात में अकेली घर छोड़ने तक पहुँच गई।
कम उम्र में विधवा हुई सेलवी
कई साल पहले सेलवी की जिंदगी बिल्कुल अलग थी। वह अपने पति और दो छोटे बेटों भास्कर और विवेक के साथ रहती थी। परिवार गरीब था लेकिन साथ था। फिर अचानक पति की मौत हो जाती है और सेलवी बहुत कम उम्र में विधवा बन जाती है। उसके सामने सबसे बड़ा सवाल अपना दुख नहीं बल्कि दो छोटे बच्चों का भविष्य होता है।
पति की मौत के बाद वह सबसे पहले ससुराल वालों से मदद मांगती है। उसे उम्मीद होती है कि कम से कम बच्चों के दादा-दादी उनका साथ देंगे। लेकिन वहाँ से साफ जवाब मिलता है कि वे दो बच्चों की जिम्मेदारी नहीं उठा सकते। सेलवी के लिए यह पहला बड़ा झटका है। जिन लोगों को वह अपना परिवार समझती थी, वही मुश्किल समय में उससे दूरी बना लेते हैं।
वह अपने मायके जाती है। वहां भी स्थिति ज्यादा अलग नहीं। वह अपनी मां से कहती है कि कुछ समय उसके साथ रह जाए ताकि वह बाहर काम कर सके और बच्चों की देखभाल हो सके। लेकिन मां कहती है कि वह अपने पति को छोड़कर बेटी के घर स्थायी रूप से नहीं रह सकती। यह बात सेलवी के दिल में कहीं गहराई तक बैठ जाती है। वह उस समय कुछ नहीं कहती, मगर वर्षों बाद यही घटना परिवार के सामने उसका सबसे मजबूत जवाब बनती है।
अब उसके पास किसी पर निर्भर रहने का रास्ता नहीं बचता। सेलवी तय करती है कि वह खुद काम करेगी और बेटों को पढ़ाएगी। वह छोटे-मोटे काम करती है, लोगों के घरों में मदद करती है, बाद में ट्रैवल एजेंसी जैसे काम से भी जुड़ती है और जितना पैसा मिलता है उससे घर चलाती है। उसकी अपनी जरूरतें हमेशा आखिरी स्थान पर रहती हैं। सबसे पहले बच्चों की फीस, खाना, कपड़े और पढ़ाई आती है।
बच्चों को हॉस्टल भेजने का दर्द
जब भास्कर और विवेक छोटे होते हैं, तब पढ़ाई और देखभाल दोनों संभालना मुश्किल हो जाता है। स्कूल से सुझाव आता है कि बच्चों को हॉस्टल में डाल दिया जाए। वहाँ पढ़ाई भी ठीक होगी और सेलवी काम भी कर पाएगी। व्यावहारिक तौर पर यह अच्छा समाधान लगता है, मगर दोनों बच्चे मां से दूर जाने को तैयार नहीं।
हॉस्टल की बात सुनते ही वे रोने लगते हैं। उनके लिए पिता पहले ही जा चुके हैं और अब मां से अलग होना असहनीय है। सेलवी बाहर से मजबूत बनने की कोशिश करती है, लेकिन खुद भी बच्चों से दूर नहीं रहना चाहती। आखिर किसी तरह स्थानीय पढ़ाई और रोजमर्रा की व्यवस्था बनाई जाती है। दोनों बेटे धीरे-धीरे बड़े होने लगते हैं और मां के संघर्ष को अपनी आंखों से देखते रहते हैं।
समाज की नजर सेलवी पर हमेशा दया की नहीं होती। कई पुरुष उसकी आर्थिक कमजोरी का फायदा उठाने की कोशिश करते हैं। कोई मदद के बदले गलत उम्मीद रखता है, कोई अकेली विधवा समझकर अनुचित प्रस्ताव देता है। सेलवी हर बार साफ मना कर देती है। उसे पैसा चाहिए, सहारा चाहिए, मगर वह अपनी मजबूरी को किसी की निजी इच्छा का साधन नहीं बनने देती।
गांव का पेरूमल नाम का आदमी भी उसके जीवन पर नजर रखता है। वह उन लोगों में है जिन्हें किसी महिला का स्वतंत्र फैसला पसंद नहीं। उसके लिए विधवा का एक तय सामाजिक ढांचा है—सादा रहो, बच्चों में जिंदगी लगा दो और अपनी इच्छाओं को हमेशा के लिए खत्म मान लो। सेलवी ऐसे नियम खुलकर नहीं तोड़ती, लेकिन भीतर से वह जानती है कि ये नियम अन्यायपूर्ण हैं।
जब पहली बार किसी ने उससे पुनर्विवाह की बात की
एक समय स्कूल से जुड़ा एक शिक्षक सेलवी से बहुत सामान्य तरीके से पूछता है कि उसने दोबारा शादी के बारे में कभी सोचा है या नहीं। सवाल सुनते ही वह असहज हो जाती है। उसके अनुभव इतने खराब रहे हैं कि उसे लगता है शायद सामने वाला भी उसका मजाक बना रहा है या कोई छिपी इच्छा रखता है।
शिक्षक समझाता है कि वह गंभीर है। सेलवी अब भी तुरंत हामी नहीं भरती। वह बताती है कि लोग विधवा महिला को बराबरी के इंसान की तरह नहीं देखते। जिसने भी उसके करीब आने की कोशिश की, अक्सर उसके अकेलेपन या पैसे की जरूरत का फायदा उठाना चाहा। किसी ने सीधे यह नहीं पूछा कि वह खुद क्या चाहती है।
यह बातचीत भास्कर तक भी पहुँचती है। उस समय भास्कर जवान तो हो रहा है, लेकिन सोच में अभी वही समाज बसता है जिसमें वह पला है। उसे मां की शादी का विचार पसंद नहीं आता। वह सेलवी से पूछता है कि इस उम्र में लोग क्या कहेंगे। वह लगभग वही तर्क दोहराता है जिन्हें गांव वाले वर्षों से सच मानते आए हैं।
एक दृश्य में वह मां को आईने के सामने खड़ा करके उम्र और समाज की बात समझाने की कोशिश करता है। उसके मन में यह नफरत से ज्यादा झिझक है। उसे अपनी मां को मां के अलावा किसी स्त्री की पहचान में देखना ही नहीं आता। सेलवी उसके शब्दों से आहत होती है, मगर बेटे से लड़ाई नहीं करती।
सेलवी का घर छोड़कर केरल जाना
कुछ समय बाद परिस्थितियाँ ऐसी बनती हैं कि सेलवी घर छोड़कर केरल में काम करने चली जाती है। वहाँ वह एक परिवार के घर में काम करती है। वह भास्कर को बार-बार फोन करती है, मगर वह नाराजगी में फोन नहीं उठाता। सेलवी अंततः उसे पैसे और एक संदेश भेजती है कि वह अब दोबारा शादी की बात नहीं करेगी, बस वह ठीक से पढ़ाई करे और अपना भविष्य बनाए।
केरल में काम करते हुए वह एक विवाहित जोड़े को साथ देखती है। उनके बीच झगड़े भी हैं, हंसी भी, देखभाल भी और रोजमर्रा की वह सहज नजदीकी भी जिसे सेलवी ने पति की मौत के बाद बहुत पहले खो दिया था। पहली बार वह अपने अकेलेपन को केवल मजबूरी नहीं बल्कि वास्तविक मानवीय जरूरत की तरह महसूस करती है।
दूसरी तरफ भास्कर मां से दूर होकर भीतर से टूटने लगता है। पढ़ाई के दौरान वह शराब और सिगरेट की तरफ भी चला जाता है। कॉलेज में एक नन जैसी सिस्टर उसकी मदद करती है। वह उसे संभालती है, पढ़ाई पर ध्यान लगाने को कहती है और धीरे-धीरे वह फिर अपने जीवन को दिशा देता है।
भास्कर इंजीनियरिंग पूरी करता है। नौकरी करने के बजाय अपना कोचिंग सेंटर शुरू करता है। वह मेहनत करके खड़ा हो जाता है। पांच साल बीत जाते हैं। अब वह आर्थिक रूप से ज्यादा समझदार है और अपनी मां के त्याग को नए नजरिए से देखता है। इसी दौरान विवेक भी कॉलेज में पढ़ रहा है और उसकी अपनी प्रेम कहानी शुरू हो चुकी है।
विवेक और संध्या का प्रेम
विवेक बचपन से संध्या को जानता है। दोनों एक ही स्कूल और फिर कॉलेज में पढ़ते आए हैं। दोस्ती धीरे-धीरे प्रेम में बदल गई है। एक दिन दोनों बस से गांव लौट रहे होते हैं। बस लगभग भरी है और केवल एक स्लीपर सीट खाली है। मजबूरी में दोनों उसी सीट को साझा कर लेते हैं।
किस्मत से संध्या की मां उसी बस में आगे किसी स्टॉप से चढ़ती है। उसे बेटी की चप्पल दिखाई देती है और स्लीपर हिस्से से एक लड़के की आवाज भी सुनाई देती है। वह तुरंत समझ जाती है कि संध्या किसी लड़के के साथ है। घर पहुँचते ही वह बेटी को बुरी तरह डांटती और मारती है। उसे लगता है कि पढ़ाई के बहाने बेटी गलत रास्ते पर जा रही है।
अगले दिन वह गुस्से में सेलवी के घर पहुँचती है और भास्कर की चप्पल तक उठाकर उसके चेहरे पर मार देती है। वह चेतावनी देती है कि अपने बेटे को उसकी बेटी से दूर रखो। सेलवी खुद भी पूरी बात नहीं जानती। घर लौटकर वह विवेक को बहुत फटकारती है।
विवेक सफाई देता है कि बस में कोई गलत हरकत नहीं हुई। सीट नहीं थी, इसलिए दोनों एक जगह बैठे। फिर वह साफ बताता है कि संध्या कोई अनजान लड़की नहीं, बचपन से उसकी दोस्त है और दोनों एक-दूसरे से प्यार करते हैं। सेलवी के सामने अब एक नया सवाल है—अपने बेटे की खुशी और गांव की सोच के बीच संतुलन कैसे बनाए।
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